Wednesday, March 28, 2012

                                      

(1)


मेरा माथा नत कर दो तुम
अपनी चरण-धूलि-तल में;
मेरा सारा अहंकार दो
डुबो-चक्षुओं के जल में।
गौरव-मंडित होने में नित
मैंने निज अपमान किया है;
घिरा रहा अपने में केवल
मैं तो अविरल पल-पल में।
मेरा सारा अहंकार दो
डुबो चक्षुओं के जल में।।

अपना करूँ प्रचार नहीं मैं,
खुद अपने ही कर्मों से;
करो पूर्ण तुम अपनी इच्छा
मेरी जीवन-चर्या से।
चाहूँ तुमसे चरम शान्ति मैं,
परम कान्ति निज प्राणों में;
रखे आड़ में मुझको
आओ, हृदय-पद्म-दल में।
मेरा सारा अहंकार दो।
डुबो चक्षुओं के जल में।।
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(आमार माथा नत क’रे दाव तोमार चरण धूलार त’ ले।)

(2)


विविध वासनाएँ हैं मेरी प्रिय प्राणों से भी
वंचित कर उनसे तुमने की है रक्षा मेरी;
संचित कृपा कठोर तुम्हारी है मम जीवन में।

अनचाहे ही दान दिए हैं तुमने जो मुझको,
आसमान, आलोक, प्राण-तन-मन इतने सारे,
बना रहे हो मुझे योग्य उस महादान के ही,
अति इच्छाओं के संकट से त्राण दिला करके।

मैं तो कभी भूल जाता हूँ, पुनः कभी चलता,
लक्ष्य तुम्हारे पथ का धारण करके अन्तस् में,
निष्ठुर ! तुम मेरे सम्मुख हो हट जाया करते।

यह जो दया तुम्हारी है, वह जान रहा हूँ मैं;
मुझे फिराया करते हो अपना लेने को ही।
कर डालोगे इस जीवन को मिलन-योग्य अपने,
रक्षा कर मेरी अपूर्ण इच्छा के संकट से।।
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(आमि / बहु वासनाय प्राणपणे चाइ...। )

(3)


अनजानों से भी करवाया है परिचय मेरा तुमने;
जानें, कितने आवासों में ठाँव मुझे दिलवाया है।
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने,
भाई बनवाए हैं मेरे अन्यों को, जानें, कितने।

छोड़ पुरातन वास कहीं जब जाता हूँ, मैं,
‘क्या जाने क्या होगा’-सोचा करता हूँ मैं।
नूतन बीच पुरातन हो तुम, भूल इसे मैं जाता हूँ;
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने।

जीवन और मरण में होगा अखिल भुवन में जब जो भी,
जन्म-जन्म का परिचित, चिन्होगे उन सबको तुम ही।
तुम्हें जानने पर न पराया होगा कोई भी;
नहीं वर्जना होगी और न भय ही कोई भी।

जगते हो तुम मिला सभी को, ताकि दिखो सबमें ही।
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने।।
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(कत’ अजानारे जानाइले तुमि...। )

(4)


मेरी रक्षा करो विपत्ति में, यह मेरी प्रार्थना नहीं है;
मुझे नहीं हो भय विपत्ति में, मेरी चाह यही है।
दुःख-ताप में व्यथित चित्त को
यदि आश्वासन दे न सको तो,
विजय प्राप्त कर सकूँ दुःख में, मेरी चाह यही है।।
मुझे सहारा मिले न कोई तो मेरा बल टूट न जाए,
यदि दुनिया में क्षति-ही-क्षति हो,
(और) वंचना आए आगे,
मन मेरा रह पाये अक्षय, मेरी चाह यही है।।

मेरा तुम उद्धार करोगे, यह मेरी प्रार्थना नहीं है;
तर जाने की शक्ति मुझे हो, मेरी चाह यही है।
मेरा भार अगर कम करके नहीं मुझे दे सको सान्त्वना,
वहन उसे कर सकूँ स्वयं  मैं, मेरी चाह यही है।।
नतशिर हो तब मुखड़ा जैसे
सुख के दिन पहचान सकूँ मैं,
दुःख-रात्रि में अखिल धरा यह जिस दिन करे वंचना मुझसे,
तुम पर मुझे न संशय हो तब, मेरी चाह यही है।।
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(विपोदे मोरे रक्षा क’रो, ए न’हे मोर प्रार्थना)

(5)


प्रेम, प्राण, गीत, गन्ध, आभा और पुलक में,
आप्लावित कर अखिल गगन को, निखिल भुवन को,
अमल अमृत झर रहा तुम्हारा अविरल है।

दिशा-दिशा में आज टूटकर बन्धन सारा-
मूर्तिमान हो रहा जाग आनंद विमल है;
सुधा-सिक्त हो उठा आज यह जीवन है।

शुभ्र चेतना मेरी सरसाती मंगल-रस,
हुई कमल-सी विकसित है आनन्द-मग्न हो;
अपना सारा मधु धरकर तब चरणों पर।

जाग उठी नीरव आभा में हृदय-प्रान्त में,
उचित उदार उषा की अरुणिम कान्ति रुचिर है,
अलस नयन-आवरण दूर हो गया शीघ्र है।।
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(प्रेमे प्राणे गाने गन्धे आलोके पुलके...।)

(6)


आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में;
आओ गन्धों में, वर्णों में, गानों में।
आओ अंगों में तुम, पुलिकत स्पर्शों में;
आओ हर्षित सुधा-सिक्त सुमनों में।
आओ मुग्ध मुदित इन दोनों नयनों में;
आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में।

आओ निर्मल उज्ज्वल कान्त !
आओ सुन्दर स्निग्ध प्रशान्त !
आओ, आओ हे वैचित्र्य-विधानों में।

आओ सुख-दुःख में तुम, आओ मर्मों में;
आओ नित्य-नित्य ही सारे कर्मों में।
आओ, आओ सर्व कर्म-अवसानों में;
आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में।।
(तुमि ! नव-नव रूपे एसो प्राणे...।)

(7)


लगी हवा यों मन्द-मधुर इस
नाव-पाल पर अमल-धवल है;
नहीं कभी देखा है मैंने
किसी नाव का चलना ऐसा।

लाती है किस जलधि-पार से
धन सुदूर का ऐसा, जिससे-
बह जाने को मन होता है;
फेंक डालने को करता जी
तट पर सभी चाहना-पाना !
पीछे छरछर करता है जल,
गुरु गम्भीर स्वर आता है;
मुख पर अरुण किरण पड़ती है,
छनकर छिन्न मेघ-छिद्रों से।

कहो, कौन हो तुम ? कांडारी।
किसके हास्य-रुदन का धन है ?
सोच-सोचकर चिन्तित है मन,
बाँधोगे किस स्वर में यन्त्र ?
मन्त्र कौन-सा गाना होगा ?
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(लेगेछे अमल धवल पाले मन्द मधुर हावा)

(8)


कहाँ आलोक, कहाँ आलोक ?
विरहानल से इसे जला लो।
दीपक है, पर दीप्ति नहीं है;
क्या कपाल में लिखा यही है ?
उससे तो मरना अच्छा है;
विरहानल से इसे जला लो।।
व्यथा-दूतिका गाती-प्राण !
जगें तुम्हारे हित भगवान।
सघन तिमिर में आधी रात
तुम्हें बुलावें प्रेम-विहार-
करने, रखें दुःख से मान।
जगें तुम्हारे हित भगवान।’
मेघाच्छादित आसमान है;
झर-झर बादल बरस रहे हैं।
किस कारण इसे घोर निशा में
सहसा मेरे प्राण जगे हैं ?
क्यों होते विह्वल इतने हैं ?
झर-झर बादल बरस रहे हैं।
बिजली क्षणिक प्रभा बिखेरती,
निविड़ तिमिर नयनों में भरती।
जानें, कितनी दूर, कहाँ है-
गूँजा गीत गम्भीर राग में।
ध्वनि मन को पथ-ओर खींचती,
निविड़ तिमिर नयनों में भरती।
कहाँ आलोक, कहाँ आलोक ?
विरहानल से इसे जला लो।
घन पुकारता, पवन बुलाता,
समय बीतने पर क्या जाना !
निविड़ निशा, घन श्याम घिरे हैं;
प्रेम-दीप से प्राण जला लो।।
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(कोथाय आलो, कोथाय ओरे आलो ? )

Tuesday, March 27, 2012

Friendship Poem - poetry fan art

                                                           Up In The Sky


by Amanda Jenkins

When you are down

And you want to get high,

Just take a good look

Up in the sky.



What you will see

Are the stars above,

And all you need

Is to proclaim your love.



Who you will find

And see so clear,

Are friends in mind

You want to hold near.



Whenever you need them

Just look up high,

Call their name

And see them fly.



Every friend you meet

Owns a star

And you can see them

No matter how far.



Whenever you are down

And want to get high,

Just take a good look

Up in the sky

earth





इतनी बड़ी धरती हमारी


और छोटे से हम



मानव, मींन. पशु, और पतिंगे

लाखो जीवों का यह घर;

धरती पर, धरती के नीचे,

कुछ रहते धरती की उपर,

सब मे जीवन, सब है बराबर,

नही है कोई कम


इतने बड़ी धरती हमारी

और छोटे से हम




रंग-बिरंगे, पर, पकांगे,

माघ, गगन पंछी मंडराते;

दाने दो ही चुगते लकिन

मीठे, लंबे गीत सुनते;

डगमग चलते, नाचा करते

खुश रहते हेर दम


इतनी बड़ी धरती हुमारी

और छोटे से हम




कई, घास, पौधे नन्हे,

जीवन रक्षक वृक्ष हुमारे;

रोटी. दल, सब्ज़ी, फल

आनोंदो के श्रोत हुमारे;

जब तक भूमि हरी रहेगी

स्वस्थ रहेंगे हम


इतने बरी धरती हुमारी

और छोटे से हम









nature pe shayari



उफ्फ! यह गर्मी, और यह धूप

न दिखे हरी घास का कोई तिनका

पंछी ने भी आमबर से मुह मोड़ लिया

न गूँजे मधूर संगीत, न दिखती तितलिय




yaaden

1.

तेरी याद में आँख भर आई

तन्हाइयो से भारी यह जुदाई

तू न आया तेरी याद चली आई

इस दिल को बहाल करने थी आई